AURAT (HINDI)
औरत इक माँ इक बहन इक बेटी हमेशा घर में होती पर उनका कोई अधिकार नहीं एक ज़माना था औरतों को पती का नाम लेने का अधिकार नहीं था पती को बच्चों के पापा कह कर बुलाया जाता था ऐसे समाज में वो अपना हक कैसे मांगतीं दुनियाँ में भी यही हाल था औरतें अपने कपड़ों में जेब तक नहीं लगा सकती थीं क्योंकि उन्हें केवल घर में ही काम करना था माता पिता के घर में बेटी परायी है शादी के बाद उसे ज़िम्मेदारियों की चाबी मिलती है लेकिन औरतों को अपने मन की चाबी नहीं मिलती उन्हें अपनी मर्ज़ी से कुछ करने का अधिकार नहीं किस मिट्टी से बनीं हैं औरतें कितना दर्द सहती हैं सारी ज़िंदगी सबके साथ हो कर भी अकेली लेकिन अब समय बदला है अब औरत नहीं है अबला अब वो मन नहीं हारती चुप नहीं रहती अपना अधिकार अपने हक के लिये लड़ सकती है नारी अब सक्षम है समझदार और ज़िम्मेदार भी जीवन के हर क्षेत्र घर और बाहर हर काम करने योग्य है और काबिल भी आज की औरत नारी शक्ति है वह देवी सरस्वती ...